रविवार, 14 जनवरी 2024

संक्राति भारतीय विविधता का प्रतिरूप

 संक्रांति या खिचड़ी एक उत्सव नहीं उत्सवों का पूरा पैकेज है। खिचड़ी, लोहड़ी, पोंगल बिहू...

हम पुरबिया रसवादी हैं। जिह्वा के स्वाद और व्यंजन से इसे पहचानते हैं। इसलिए मकर संक्रांति न कहकर इसे 'खिचड़ी' कहते हैं और वैशाख वाली मेष संक्रांति को 'सतुआन'। धर्म-कर्म अपनी जगह जिह्वा अपनी जगह। ढूंढा, ढूंढी, तिलवा, तिलकुट से सजी हुई डाली और थाली में दही गुड़ चिउड़ा के साथ आलू गोभी की सब्जी जितनी सरस लगती है उतनी पूरे साल में किसी और दिन नहीं लगती। खिचड़ी जैसा साधु और सात्विक आहार भी इतना चटक हो सकता है यह आज ही पता चलता है। 'खिचड़ी के हैं चार यार चटनी चोखा घी आचार'। सो खिचड़ी इन चारों चटकार यारों की सोहबत में चटकार क्यों न हो ?
सुबह के धुंधलके में गांव से भजन गाती गंगा की ओर जाती झुंड की झुंड स्त्रियां-बच्चे-पुरुष और तिझरिया चने-मटर-गेहूं-सरसों की झूमती पंगत, हरे-भरे खेतों का चटक चोला पहने गाँव का सीवन और उसमें झुककर रंग बिरंगे वस्त्रों में सज साग खोंटती युवतियां-युवक-बच्चे मेरे बचपन के गांव की स्मृतियों में इस खिचड़ी के स्वाद से कम चटक और रसर नहीं दिखते। चक्षु, श्रवण और जिह्वा तीनों का रसपान का भी एक पूरा पैकेज ही है, जो खिचड़ी पर ही सुलभ है।
गांव के ये दृश्य अब मेरे ही नहीं गांव में रहने वालों के लिए भी बहुत कुछ स्मृति का विषय बन गए हैं। यांत्रिकता और संचार क्रांति ने शहर और गांव दोनों के बोध, संस्कार और मनोभाव तेजी से बदले हैं।