साहित्य-संवाद
साहित्य समय और संस्कृति
शनिवार, 23 मई 2026
समहुत
स्मृतियाँ बड़ी गहरी होती हैं। जब वे बचपन से जुड़ी हों तो अधिक स्थायी और मोहक होती है; अधिक दीर्घजीवी भी। वे इस तरह मनो मस्तिष्क में बैठ जाती हैं कि चाहे जितना रूठ लें उनसे हाथ छुड़ाकर जाना नहीं होता। बार-बार उनकी याद उनके सहचर्या की अनुभूति टीस जगाती है और उस टीस का भी अपना सुख होता है। यातना या आत्मपीड़न में रस हर किसी को नहीं मिलता, लोग उससे उबरने का यत्न करते हैं, पर कुछ लोग उसी में आनंद अनुभव करने लगते हैं। शायद उनकी मानसिक बनावट ही कुछ ऐसी होती है। यूं कभी कोई नशा तो नहीं किया इसलिए ठीक-ठीक नहीं कह सकता, पर यह यातना ही उनका 'एडिक्शन' है। बहरहाल कुछ 'स्मृतियो' के प्रति कुछ ऐसा ही एडिक्शन मेरे भीतर भी है। महानगर में रहता हुआ भी बार-बार गाँव की तरफ भाग चलना। उन अमराइयों की छाँह तलाशना जो अब केवल मेरे भाव-जगत में हैं। उन ऋतुओं को जीना जो गाँव और प्रकृति से भी विदा हो गई हैं । उन 'रिचुअल्स' से जुड़ाना जो असल में वहाँ भी नहीं बचे, जहां उनका वजूद था।
'रोहिणी' का साथ ऐसा ही एक प्रकरण है। तपती हुई धरती और आसमान के बीच दूर दूर तक धूप में झुलसा हुआ सीवान और पुरनका पोखरे के भीटे पर आम महुआ की पाँत में एक पोखर की ओर लटका हुआ एक आम का पेड़ । पूरे बगीचे में आम का समाहूत कराने वाला पेड़ । रंग ऐसा कि राहगीर को भी दूर से दिख जाए एक डैम चटख पीला । हरे-हरे पत्तों के बीच उसकी पीतांबरी अलग ही चमकती थी । रोहिणी नक्षत्र में पकता इसलिए नाम था रोहिनियवा। गूदे और स्वाद भी किसी 'हाई-प्रोफाइल' आम से कम सुस्वादु और रसेदार नहीं। आकार औसत और पोथियों में बने आम का समरूप।
यह समहुता आम था। समहुति लाठी, समहुति थाली, समहुति लोटे, समहुति कुदाल और समहुति पीढ़े की तरह यह भी हल्दी, दूब, दही और अक्षत के साथ सजा हुआ चौके पर बिराजमान। 'समहुत' एक किसान के जीवन का सबसे बड़ा पर्व है। होली दिवाली दशहरा की तरह धूम-धाम लक़दक़ और शोर-शराबे वाला नहीं। किसान के सुख-दुःख समभ्यस्त जीवन की तरह एक सं शांत सहज और सात्विक। यह उस खेत की पूजा है, जो हमें आहार देता है । उस धरती की जिसे चीरकर हम अन्न उपजाते हैं । किसान अगली साल फसल लेने के लिए उसे जोतने से पूर्व उसकी पूजा करता है, उसकी अनुमति लेता है और पिछली फसल के लिए उसे धन्यवाद देता है। खेत ही उसका पालक पिता है और धरती ही उसकी मां। समहुत इन दोनों के पूजन का उत्सव है। इसी किसान के कैलेंडर वर्ष का पहला त्यौहार है। बरिस दिन का दिन है। नए को संचित करने और पुराने का उपभोग करने के आशीर्वाद का दिन।
बचपन में 'समहूत' एक देशज शब्द लगता था पर बाद में उसका स्रोत संस्कृत होने का पता चला, लेकिन मन अब भी उसे देशज ही मानता है । शब्द अपने आप में न तत्सम होते हैं न तद्भव या देशज, यह भाषा शास्त्रियों के अध्ययन के लिए है । वे जिससे जुड़े हों उसके हो लेते हैं। अगर उसका जुड़ाव 'देसज' से है तो आप दावा करते रहिए उसके तत्सम या तद्भव का हमें क्या ? मेरा किसान-संस्कार उसे देशज ही मानता है। इसी तरह रोहिणी भी मेरे मानस में नक्षत्र नहीं स्मृति है, किसी ज्योतिष से पंचांग में वह आज आएगी, कल या परसों मुझे नहीं पता मेरे मन में वह आज ही उतर आई है। रोहिनियवा के उकठे लगभग छह साल होगे लेकिन उसका रंग रूप स्वाद मेरे आँखों और जीभ पर अब भी बसा है। समहूत से भौतिक जुड़ाव लगभग बीस साल पहले छूट गया, लेकिन रोहिणी के चढ़ते ही वह मेरे मन में वह हर बार घटित होता है, जीभ हर बार दाल पूरी और आम वाले गुरम्हा के लिए लपक पड़ती है और रोहनियावा आम की पीतांबरी वैष्णव छवि मेरे स्मृति में हर बार कौंधती है।
अब तो उसके सारे संघतिया भी लगभग विदा हो चुके। कटहरियावा, करुअसना, ठोरहवा, चपटका, तीन कोइलियवा... सब के सब। कुछ महुए के पेड़ बचे हैं, नहीं तो पूरा भीटा उजाड़-खण्ड है। बिजली पंखे और ईंट की भट्ठियों में दुबका गाँव भी उधर का रुख अब कम ही करता है । सुबह बोरा, लोटा और सोटा लेकर गर्व से बगीचे की ओर जाने वाली पीढ़ी भी अब अधेड़ हो चली है । रोजी रोजगार की तलाश में नगरों और महानगरों में पलायन कर चुकी है। जो बची है ,अपने को बचाने-संभालने की जुगत में दीन रात खर्च हो रही है । उसे स्मृतियों को जीने दुहराने या जी भर जीने की फुरसत भी कहाँ ? भूगोल भले अब भी वही हो, चेतना और संस्कार बादल चले हैं। जो जीवन और अनुभव के विषय थे, धीरे-धीरे सब संग्रहालयों और शब्द कोशों तक सिमट रहे हैं।
मेरा मन अब भी उन्हीं स्मृतियों के कबाड़ में उलट-पुलट करता है। अपनी बीती और पुरानी दुनिया में अब भी कुछ न कुछ नया खोजता है। उसी में लोहा लक्कड़ लक्कड़ की उलट-पुलट करते कोई कील-कांटी चुभ जाती है और बार-बार करकती रहती है। वैसे भी मन कोई चुभी हुई गांठ मुझसे निकलती नहीं, उसकी चुभन मुझे गांठों से भरे हुए नए-नए केथा (कंथा) पर सोने जैसा सुख मिलता है। सहज-सपाट और मखमली गद्दे से अथिक जीवन का केथा ही मुझे अधिक सुहाता है। उसकी चुभन जीवन के होने का आभास देती है। सच कहूँ तो जब भी जीवन के केथे में कोई पुरानी गाँठ दब जाए तो नई जोड़ लेनी चाहिए । कम देखें
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